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Friday, 2 March 2018

बदलता नज़रिया Part II

नीरज जी ने खुशी खुशी मोनू का स्वागत किया। वह भी इस समय तक घर का काम खत्म कर चुके थे और अपने लिए चाय बना रहे थे। मना करने पर भी, उन्होंने मोनू के लिए भी चाय बनाई और दोनों हाउस हसबैंड्स चाय की चुस्कियां लेने लगे। नीरज जी इस समय भी साड़ी में थे जबकि मोनू शर्ट पैंट पहने हुए था लेकिन उसने ध्यान दिया कि नीरज जी इस बात से बिल्कुल बेपरवाह थे। नीरज जी ने हरी साड़ी और उससे मैचिंग हरा ब्लाउज पहना था। उनके कानों में बालियां और गले में मंगलसूत्र था। लाल रंग की नेलपौलिश, बिन्दी और लिपस्टिक थी और माँग मे सिंदूर भी था। उसने यह भी देखा कि मोनू को तो नौरमल चाय मिली थी लेकिन नीरज जी लैमन टी पी रहे थे।
बात की शुरुआत चाय से ही हुई जब मोनू ने पूछा कि वह लैमन टी क्यों पी रहे हैं। "फिगर का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा। बैबुटौक्स हमारे ब्रैस्ट्स ही तो बढ़ाता है। बाकी का शरीर तो खुद ही मेंटेन करना है।" नीरज जी ने कहा। "आप तो सब कुछ ही मेंटेन कर रहे हैं" ना चाहते हुए भी, मोनू का लहजा, व्यंग्यात्मक हो गया। "मैं इसमें कोई बुराई नहीं समझता हूँ" नीरज जी बिल्कुल सरलता से बोले। " इनको औफिस में पता नहीं किस किस मुसीबत से जूझना पड़ता है। हर आफत का सामना करने के बाद जब ये घर वापस आती हैं तो उस समय इनका स्वागत करने के लिए मैं अगर सजधज कर इंतजार करता मिलूँ तो इनका भी मन तरोताजा हो जाता है। "इंतजार तो मैं भी करता हूँ पर गरिमा तो आते ही झुंझलाने लगती है।" मोनू के स्वर में कड़वाहट थी। 

नीरज जी मुस्कुरा दिये, "दरअसल तुम्हारी प्रौब्लम ही यही है। तुम हाउस हसबैंड तो बन गए हो लेकिन तुमने जीजी को घर की मालकिन नहीं माना है। तुम इस समय भी उनका नाम ले रहे हो। यदि तुम वास्तव में सुखी रहना चाहते हो तो उनके सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण करना पड़ेगा। उनके दिल पर राज करना है तो उनका गुलाम बनना पड़ेगा। जिस दिन, तुम अपनी खुशी से पहले, उनकी खुशी के बारे में सोचना शुरू कर दोगे, उसी दिन तुम्हें खुशी के असली मायने पता चल जाएँगे।"


मोनू की आँखों में नमी आ गई थी। रुँधे हुए गले से उसने नीरज जी से पूछा,"आप बताइए कि मैं अब क्या करूँ?" नीरज जी खड़े हुए और मोनू को गले से लगा लिया। बहुत धीमी आवाज में उन्होंने कहा," तुम अभी तक नहीं समझे। मुझसे मत पूछो। सिर्फ वो करो जो गरिमा जीजी चाहती हैं। सबसे पहले उनका नाम लेना बन्द करो और उनको वो इज्ज़त दो जिसकी वो हकदार हैं"।

अपने फ्लैट में वापस लौट कर, मोनू काफी देर तक इसी बारे में सोचता रहा। एक ओर उसकी विलुप्त होती मर्दानगी थी और दूसरी ओर पारिवारिक जीवन का अस्तित्व। बहुत देर तक सोचने के बाद उसने अपनी मर्दानगी के बलिदान का निश्चय कर लिया।

उस दिन गरिमा को औफिस से लौटने में बहुत देर हो गई। उसका मोबाइल भी बन्द था। रात नौ बजे तक मोनू का घबराहट से बुरा हाल हो गया था जब उसने गरिमा को सोसायटी के गेट से अन्दर आते देखा। वह भागा भागा पास पहुँचा तो उसने देखा कि गरिमा लड़खड़ा रही थी और उसमे से शराब की बदबू आ रही थी। मोनू उसको सहारा दे कर अन्दर लाया और बिस्तर पर लिटाया। गरिमा ने लड़खड़ाती ज़ुबान मे सिर्फ इतना कहा," सौरी डार्लिंग, रिया ने औफिस मे अपने प्रमोशन की पार्टी दी थी। उसमें कुछ ज्यादा हो गई"। इतना कह कर गरिमा ने करवट बदली और सो गई।

मोनू पलक झपकते ही सारा मामला समझ गया। उस दिन की औफिस पार्टी में रिया के पति ने बहुत सुन्दर साड़ी पहनी थी और बहुत देर तक गरिमा की बौस के पति के साथ बातें कर रहा था। बात तो मोनू ने भी करने की कोशिश की थी लेकिन उसके कोट पैंट मे होने के कारण किसी भी महिला या पुरुष ने उससे बात करना पसंद नहीं किया था।प्रमोशन के लिए बोर्ड की मीटिंग में यह बात ज़रूर गरिमा के खिलाफ गई होगी कि जो महिला अपने पति को मैनेज नहीं कर पा रही है वो कम्पनी मैनेज कैसे करेगी, इसीलिए गरिमा की जगह रिया को मैनेजर बनाया गया था।

सच्चाई यही थी कि ज्यादातर महिलाओं ने अपने पतियों को जबरन बैबुटौक्स लगवा कर इस रूप में पहुँचा दिया था लेकिन गरिमा, मोनू से बहुत प्यार करती थी और उसकी मर्जी के विरुद्ध, उससे मारपीट कर के, जबरदस्ती कोई काम नहीं कराना चाहती थी। मोनू का दिल, ग्लानि से भर गया। उसने गरिमा के सोते मे ही, उसके जूते मोज़े उतारकर, उस पर चादर उड़ाई और उसकी बगल में सोने के लिए लेट गया।

अगले दिन सुबह, मोनू जैसे बदल चुका था। जब से गरिमा ने बैबुटौक्स लगवाया था, वो रोज़ सुबह मोनू की आधी नींद में ही, उसे बाँहों में भर के छेडख़ानी करती थी और मोनू को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। इसके बिल्कुल विपरीत, आज सुबह, जब गरिमा ने उसे बाँहों मे लिया तो उसे बहुत अच्छा लग रहा था। रोज़ सुबह गरिमा के औफिस जाने से पहले जब वह उस पर झुँझलाती थी तो आज मोनू को उसकी झुँझलाहट पर भी प्यार आ रहा था। गरिमा के औफिस के लिए निकलने से पहले, उसने अपने हाथों से गरिमा की टाई की गाँठ ठीक की और नज़र नीची कर के बोला," सुनिये जी, शाम को जल्दी घर आ जाइएगा। मुझे साथ लेकर डॉक्टर के यहाँ चलना है"। "क्या हुआ? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? और मैं गरिमा से 'सुनिये जी' कब से हो गई? गरिमा ने एक साथ तीन सवाल दाग दिये।

"मुझे बैबुटौक्स लगवाना है" शरमाते हुए मोनू ने जवाब दिया।

गरिमा ने मोनू को अपनी बाँहों मे भर कर हवा में उठा लिया। 

1 comment:

  1. nice rolereversal..every line every word making it a real story..nice story plot you have in mind ..

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